रायगढ़। कोयला, उद्योग और विकास की रफ्तार के बीच रायगढ़ जिले के जंगलों में रहने वाले वन्यप्राणियों के अस्तित्व पर संकट गहराता नजर आ रहा है। जिले के धरमजयगढ़, घरघोड़ा, तमनार और छाल क्षेत्र में संचालित एक दर्जन से अधिक कोल ब्लॉकों के साथ लगातार बढ़ते औद्योगिकीकरण का सीधा असर जिले के पर्यावरण और वन क्षेत्रों पर पड़ रहा है। प्रदूषण का बढ़ता ग्राफ अब सिर्फ इंसानों के लिए ही चिंता का विषय नहीं है, बल्कि जंगलों में विचरण करने वाले वन्यजीव भी इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकाने को मजबूर हैं।
जिले के कई औद्योगिक क्षेत्रों में लगातार कटते जंगल, कोयला खनन और उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ स्थानों पर उद्योगों से निकलने वाला दूषित पानी नदी-नालों में पहुंच रहा है। इससे जलस्रोतों का पानी प्रदूषित होने के साथ-साथ जलीय जीवों और जंगल पर निर्भर वन्यप्राणियों के लिए भी खतरा बढ़ रहा है। जो आने वाले समय में और घातक साबित हो सकता है।
जंगलों में चोरी-छिपे फ्लाई ऐश डंपिंग का आरोप
औद्योगिक प्रदूषण का एक बड़ा खतरा फ्लाई ऐश को लेकर भी सामने आता रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक उद्योगों से निकलने वाली फ्लाई ऐश को कई बार जंगल और सुनसान इलाकों में चोरी-छिपे डंप किए जाने की शिकायतें सामने आती हैं। खुले में पड़ा फ्लाई ऐश हवा के साथ आसपास के क्षेत्रों में फैलता है और बारिश के दौरान इसके कण पानी के स्रोतों तक पहुंच सकते हैं। इससे जंगल और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका बनी रहती है।
हाथियों की बढ़ती आवाजाही के बीच बढ़ी चिंता
रायगढ़ जिले के जंगल पहले से ही हाथियों समेत कई वन्यजीवों का प्रमुख रहवास क्षेत्र हैं। जंगलों के आसपास लगातार खनन, सड़क, उद्योग और अन्य गतिविधियों का विस्तार होने से वन्यजीवों के प्राकृतिक कॉरिडोर प्रभावित होने की चिंता बढ़ रही है। खासकर हाथियों की लगातार बढ़ती आवाजाही के बीच जंगल और जलस्रोतों का संरक्षण बेहद जरूरी माना जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि जंगल सिर्फ पेड़-पौधों का समूह नहीं है, बल्कि यह वन्यजीवों का घर है। जब जंगल के भीतर पानी, हवा और जमीन तक प्रदूषण की चपेट में आने लगे तो उसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है।
विकास जरूरी, लेकिन जंगलों की कीमत पर नहीं
रायगढ़ औद्योगिक विकास की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना भी बड़ी चुनौती है। ग्रामीणों का कहना है कि उद्योग और खनन जरूरी हो सकते हैं, लेकिन इसके लिए जंगल और वन्यजीवों के अस्तित्व को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। ग्रामीणों ने मांग की है कि औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट, दूषित पानी और फ्लाई ऐश के निपटान की नियमित निगरानी की जाए। जंगलों के आसपास अवैध डंपिंग पर सख्ती हो और प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों पर जिम्मेदारी तय की जाए।
ग्रामीणों की चिंता साफ है—अगर विकास की रफ्तार के साथ प्रदूषण भी इसी तरह बढ़ता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब रायगढ़ के जंगलों में विचरण करने वाले कई वन्यप्राणियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
