रायगढ़। जंतर-मंतर मार्ग पर हुए जेएनजी आंदोलन के बाद अब आंदोलन की यह तस्वीर स्कूलों से लेकर कॉलेज परिसरों तक दिखाई देने लगी है। स्कूली बच्चों से लेकर कॉलेज के युवाओं और बेरोजगारों तक में व्यवस्था को लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही है। लोग सीधे सोते नेताओं और खोखले सिस्टम के खिलाफ आवाज बुलंद करने लगे हैं। इसी सड़क को लेकर दो दिन पहले ही गांव के लोगों ने बारिश से भरे गड्ढे को लेकर बड़ा हंगामा किया था और इतना ही नही एक युवक ने तो कपड़े उतारकर इसमें नहाते हुए प्रदेश के वित्त मंत्री ओपी चौधरी, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सहित क्षेत्र के नेताओं को जमकर कोसते हुए इस दुदर्शा पर अपना गुस्सा जताया।
इसी बदलते तेवर की एक तस्वीर रायगढ़ जिले की खरसिया विधानसभा में भी देखने को मिली, जहां खस्ताहाल सड़क के निर्माण कार्य को लेकर स्कूली बच्चों ने अपनी पढ़ाई छोड़कर सड़क पर मोर्चा खोल दिया।
गड्ढों ने छीनी राह, बच्चों ने थाम लिया आंदोलन का मोर्चा
भालुनारा से राबर्टसन स्टेशन तक की सड़क वर्षों से जर्जर हालत में है। जगह-जगह बने गहरे गड्ढे और बारिश में सड़क की बिगड़ती हालत ग्रामीणों के साथ-साथ स्कूली बच्चों के लिए भी परेशानी का बड़ा कारण बनी हुई है। रोज स्कूल आने-जाने वाले बच्चों को दुर्घटना के खतरे के बीच सफर करना पड़ता है।
बताया जा रहा है कि सड़क निर्माण का काम मार्च महीने में शुरू होना था, लेकिन ठेकेदार की लापरवाही के चलते काम शुरू नहीं हुआ। लंबे समय तक इंतजार करने के बाद ग्रामीणों के साथ स्कूली बच्चों ने भी सिस्टम के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। बच्चों ने सड़क पर जमकर प्रदर्शन किया और चक्का जाम कर दिया। किताब-कॉपी छोड़कर सड़क पर उतरे बच्चों के तेवर देखकर प्रशासनिक अमले में भी हलचल मच गई।

दो घंटे में जागा प्रशासन, दौड़ता हुआ पहुंचा ठेकेदार
आंदोलन की सूचना मिलते ही पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने नाराज बच्चों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन बच्चे अपनी मांग से पीछे हटने को तैयार नहीं थे। बच्चों ने अधिकारियों को सड़क की बदहाली, दुर्घटनाओं के खतरे और बारिश के दिनों में होने वाली परेशानियों से अवगत कराया। इस दौरान बच्चों ने बेखौफ होकर नारे भी लगाए—
“हमें हमारी सड़क चाहिए!”
आंदोलन का असर ऐसा हुआ कि करीब दो घंटे के भीतर प्रशासन सक्रिय नजर आया और ठेकेदार को मौके पर बुलाया गया। सड़क निर्माण कार्य शुरू होने की प्रक्रिया आगे बढ़ने के बाद ही बच्चों ने अपना आंदोलन समाप्त किया।
‘जेन अल्फ़ा’ का नया तेवर—सवाल भी, संघर्ष भी
खरसिया की यह घटना केवल सड़क निर्माण की मांग तक सीमित नहीं है। यह उस नई पीढ़ी की बदलती सोच की तस्वीर भी है, जो समस्याओं को चुपचाप सहने के बजाय सवाल पूछना सीख रही है।
जेन अल्फ़ा के इन बच्चों ने यह संदेश दिया है कि किताबें हाथ में होने का मतलब यह नहीं कि वे अपने अधिकारों के लिए आवाज नहीं उठा सकते। जहां जिम्मेदारों की चुप्पी लंबी होती गई, वहां बच्चों की आवाज ने महज कुछ घंटों में व्यवस्था को हरकत में ला दिया। जिस सड़क के लिए सालों से आवाज उठती रही, उसी सड़क के लिए जब बच्चों ने मोर्चा संभाला तो प्रशासन जाग गया। यह सवाल भी अब खड़ा हो रहा है कि आखिर जनता की आवाज सुनने के लिए आंदोलन क्यों जरूरी हो जाता है? नेताओं की नींद कब टूटेगी और सिस्टम कब अपनी जिम्मेदारी बिना दबाव के निभाएगा? खरसिया के इन बच्चों ने सिर्फ सड़क नहीं मांगी—उन्होंने सोई हुई व्यवस्था को जगाने का काम किया है।
