बीते एक महीने के दौरान झारखंड और उससे सटे छत्तीसगढ़, बिहार और मध्य प्रदेश में कई ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, जब गुस्सैल हाथियों के झुंड ने गांव या खेत पर हमला कर नुकसान पहुंचाया और कम से कम दस लोगों की जान ले ली। जब जंगल में हाथी का पेट नहीं भर पाता, तो वह बस्ती का रुख करता है। हमें समझना होगा कि वन के पर्यावरणीय तंत्र में हाथी एक अहम कड़ी है और उसकी बेचैनी का असर समूचे परिवेश पर पड़ता है।
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बीते कुछ वर्षों में हाथी से कुचल कर मरने वाले इंसानों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसकी प्रमुख वजह है, हाथियों और इंसानों के बीच बढ़ता टकराव। वर्ष 2018 -19 में 457, वर्ष 19-20 में 586, वर्ष 20-21 में 464, वर्ष 21-22 में 545 और वर्ष 22-23 में 605 लोग मारे गए। केरल के वायनाड जिले का 36 फीसदी इलाका जंगल है, जहां पिछले साल हाथियों और इंसानों के टकराव की 4,193 घटनाएं हुईं और इनमें 27 लोग मारे गए। देश में ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, असम, केरल, कर्नाटक सहित 16 राज्यों में हाथियों के साथ इंसानों का टकराव बढ़ा है, जिनमें बड़ी संख्या में हाथी भी मारे जाते हैं। पिछले तीन वर्षों के दौरान लगभग 300 हाथी मारे गए हैं।
डब्लूडब्लूएफ-इंडिया की रिपोर्ट ‘द क्रिटिकल नीड ऑफ एलीफेंट’ बताती है कि दुनिया में इस समय कोई 50 हजार हाथी बचे हैं, जिनमें से 60 फीसदी का आसरा भारत है। देश के 14 राज्यों में 32 स्थान हाथियों के लिए संरक्षित हैं। दुनिया भर में हाथियों को संरक्षित करने के लिए गठित आठ देशों के समूह में भारत भी शामिल है। हमारे देश में इसे ‘राष्ट्रीय धरोहर पशु’ घोषित किया गया है। इसके बावजूद देश में बीते दो दशकों में हाथियों की संख्या स्थिर हो गई है।
वर्ष 2018 में पेरियार टाइगर कंजर्वेशन फाउंडेशन ने केरल में हाथियों के हिंसक होने पर एक अध्ययन किया था, जिससे पता चला कि जंगल में पारंपरिक पेड़ों को काटकर उनकी जगह नीलगिरी और बाबुल बोने से हाथियों का भोजन समाप्त हुआ और यही उनके गुस्से का कारण बना। पेड़ों की ये किस्में जमीन का पानी भी सोखती हैं, सो हाथी के लिए पानी की भी कमी हुई।
वन पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता को सहेज कर रखने में हाथियों की महत्वपूर्ण भूमिका हैं। पयार्वरण-मित्र पर्यटन और प्राकृतिक आपदाओं के बारे में पूर्वानुमान के लिहाज से भी हाथी बेजोड़ हैं। अधिकांश संरक्षित क्षेत्रों में हाथियों के आवास के पास बस्तियां हैं, जहां के लोग वन संसाधनों पर निर्भर हैं। इसी वजह से हाथियों और इंसानों के बीच संघर्ष की स्थिति बनी है।
जंगल में जहां इस विशालकाय जंतु का निवास होता है, वहां आम तौर पर शिकारी और जंगल की कटाई करने वाले घुसने का साहस नहीं करते। इसलिए वहां हरियाली सुरक्षित रहती है और बाघ, तेंदुए, भालू जैसे जानवर भी निरापद रहते हैं।
कई सदियों से हाथी अपनी जरूरत के अनुरूप अपना स्थान बदला करते थे। गजराज के आवागमन के इन रास्तों को ‘गज-गलियारा’ कहा गया। जब कभी पानी या भोजन का संकट होता है, गजराज ऐसे रास्तों से दूसरे जंगलों की ओर जाते हैं, जिनमें मानव बस्ती न हो। देश में हाथी के सुरक्षित कोरिडोर की संख्या 88 है। इसमें 22 पूर्वोत्तर राज्यों, 20 मध्य भारत और 20 दक्षिणी भारत में हैं। दरअसल, गजराज की सबसे बड़ी खूबी है उनकी याददाश्त। आवागमन के लिए वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी परंपरागत रास्तों का ही इस्तेमाल करते आए हैं।
बढ़ती आबादी के भोजन और आवास की कमी को पूरा करने के लिए जंगलों को काटा जा रहा है। हाथियों को जब भूख लगती है और जंगल में कुछ मिलता नहीं या फिर जल-स्रोत सूखे मिलते हैं, तो वे खेत या बस्ती की ओर आ जाते हैं। मानव आबादी के विस्तार, हाथियों के प्राकृतिक वास में कमी, जंगलों की कटाई और बेशकीमती हाथी दांतों का लालच, आदि कुछ ऐसे कारण हैं, जिनके चलते हाथियों को निर्ममता से मारा जा रहा है।
विडंबना देखिए कि जिस देश में हाथी के सिर वाले गणेश को प्रत्येक शुभ कार्य से पहले पूजने की परंपरा है, वहां की बड़ी आबादी हाथियों से छुटकारा चाहती है। यह समझना जरूरी है कि धरती पर इंसानों का अस्तित्व तभी तक है, जब तक जंगल हैं और जंगल में जितने जरूरी बाघ हैं, उससे अधिक अनिवार्यता हाथियों की है।